मै नास्तिक क्यों हु - A Motivational Story - Bhagat Singh

  • मै नास्तिक क्यों हु - A Motivational Story - Bhagat Singh

     

    २०वी सदी के शुरुआती दसको में भारत दी आजादी की लड़ाई अपने चरम  पर थी।  महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओ ने जहा असहयोग और अहिंसा के साथ लड़ाई लड़ी, वही क्रांतिकारियों ने आजादी के संघर्ष में अपना पसीना और खून बहाया।  कई नामो में एक सितारा था - भगत सिंह।  २३ साल की छोटी सी उम्र में देश के लिए प्राण न्योछावर कर दिए। उसके बाद के वर्षों में वह बहुतों के लिए मूर्ति बना। एक पढ़े लिखे युवा और सावधानीपूर्वक  समाजवादी क्रन्तिकारी  के रूप में मनाया जाने वाला उनका नाम भारतीय इतिहास में एक नायक के रूप में खून से अंकित है। भगत सिंह का जन्म १९०७ में ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रान्त में हुआ था।  उनके माता पिता किशन सिंह और विद्यावती भी भारतीय सवतंत्रता आंदोलन का हिसा थे, इसलिए कहने की जरुरत नहीं है कि भगत सिंह जीवन में ही इन विचारो से अवगत हो गए थे।  चूँकि उनके दादा सवामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज के अनुयाई थे, इसलिए भगत सिंह भी इससे प्रभावित थे।  उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा भी डीएवि  स्कूल से पूरी की । जब उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया तो वह एक आलराउंडर थे।  

     

    वह समाजवादी दर्शन से बहुत प्रभावित थे, और उन्होंने मार्च १९२६ में नौजवान भारत सभा के नाम से जाने जाने वाले भारतीय समाजवादी युवा  संगठन की स्थापना की।  वह चंदरशेखर आजाद और राम प्रसाद बिस्मिल के साथ हिंदुस्तान रिपुब्लिकेशन असोसिएशन का भी हिसा थे।  अन्य पर्सिद क्रन्तिकारी सवतंतर्ता सेनानियों के बीच।  उनके परिवार वालो ने सोचा की वह सवतंत्रता की लड़ाई में बहुत गहराई से जुड़ गया है , तो परिवार वालो ने उनकी सदी करने का विचार किया तो वो घर से भाग गए। 

     

    उनके सब्दो में विचारो को बदलने के शक्ति थी, और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें १९२७ में उनके क्रांतिकारी विचारो के लिए और उन्हें संभावित खतरे के रूप में देखते हुए  गिरफ्तार कर लिया, क्योकि उनके विचार बहुत सरे युवाओ को प्रभावित कर रहे थे। 

     

    १९२८  में जब साइमन कमीशन ने लाहौर का दौरा किया, तो १ मार्च को आयोग के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए लाला लाजपत राय ने नेतर्तव किया। भीड़ को डराने के लिए पुलिस ने लाला लाजपत राय पर लाठिया भी चार्ज करवा। लाला लाजपत राय की १७ नवम्बर १९२८ को दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गयी लेकिन डाक्टरों के अनुसार यह लाठी चार्ज की घातक चोटों के कारण भी सकती है। 

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